
झाँसी, 30 जनवरी 2026। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी में आयोजित चतुर्थ भारतीय उद्यानिकी शिखर बैठक सह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन–2026 का समापन भव्य रूप से संपन्न हुआ। तीन दिवसीय इस अंतर्राष्ट्रीय आयोजन का आयोजन विश्वविद्यालय द्वारा बागवानी अनुसंधान एवं विकास समिति, उत्तर प्रदेश के सहयोग से किया गया।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते कुलपति डॉ अशोक कुमार सिंह ने कहा कि उद्यानिकी आज कृषि का सबसे तेजी से उभरता क्षेत्र है, इसका राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और सकल घरेलू उत्पाद में योगदान लगातार बढ़ रहा है। फल, सब्जियाँ तथा पोषण एवं औषधीय महत्व वाली फसलें न केवल खाद्य व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित कर रही हैं, बल्कि स्वास्थ्य आधारित कृषि की दिशा भी तय कर रही हैं। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, मानकीकरण, रोग-कीट प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का समाधान प्राकृतिक एवं जैविक खेती आधारित वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही संभव है।
कुलपति ने बताया कि नई उद्यानिकी विज्ञान में सटीक खेती, संरक्षित खेती, पॉलीहाउस, हाईटेक नर्सरी और स्मार्ट तकनीकों की अहम भूमिका है। स्वदेशी एवं ‘सुपर फ्रूट्स’, फसल विविधीकरण, सशक्त बाजार संपर्क और मूल्य संवर्धन पर बल देते हुए उन्होंने प्रगतिशील किसानों को पहचान व सम्मान देने की आवश्यकता बताई। प्रो. सिंह ने वैज्ञानिकों और युवाओं से आह्वान किया कि अनुसंधान को प्रयोगशालाओं से निकालकर खेतों तक पहुँचाया जाए, ताकि उद्यानिकी आधारित कृषि अधिक लाभकारी, टिकाऊ और रोजगारोन्मुख बन सके।
अध्यक्ष, बागवानी अनुसंधान एवं विकास समिति एवं भूतपूर्व कुलपति डॉ. बलराज सिंह ने कहा कि सम्मेलन में देशभर से 250 से अधिक वैज्ञानिकों ने सहभागिता की। मौखिक व पोस्टर प्रस्तुतियों के माध्यम से फसल सुधार, बीज गुणवत्ता, मूल्य संवर्धन, कीट-रोग प्रबंधन तथा बुंदेलखंड क्षेत्र में उद्यानिकी के विस्तार पर सार्थक चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि सम्मेलन ने अनुसंधान, नवाचार और नीति-निर्माण के बीच सेतु का कार्य किया है तथा पैनल चर्चाओं से निकले निष्कर्ष भविष्य की किसान-हितैषी योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
आयोजन सचिव डॉ. मनीष श्रीवास्तव ने कहा कि यह सम्मेलन केवल शैक्षणिक आयोजन नहीं, बल्कि स्वदेशी, पोषण-संवेदनशील और अल्प-प्रयुक्त उद्यानिकी फसलों को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की ठोस पहल है। उद्यानिकी किसानों की आय वृद्धि, पोषण सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण उद्यमिता का मजबूत आधार बन सकती है।
सम्मेलन में बुंदेलखंड की अर्ध-शुष्क जलवायु को ध्यान में रखते हुए मोरिंगा (सहजन), आंवला, बेल, आम, अमरूद, हरड़, बहेड़ा, सीताफल जैसी सहनशील फल-औषधीय फसलों के विस्तार की संभावनाओं पर जोर दिया गया। साथ ही कम अवधि व कम जल वाली सब्जी-मसाला फसलें—जैसे जीरा, धनिया, मेथी, पालक, लौकी व तोरई—किसानों को त्वरित आय देने में सहायक बताई गईं। ब्रोकली, गाजर, टमाटर, अदरक, हल्दी तथा देशी गुलाब जैसी फसलों से मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और विपणन के माध्यम से आय बढ़ाने पर बल दिया गया।
सम्मेलन की सिफारिशों में क्षेत्र-विशिष्ट, जलवायु-सहिष्णु किस्मों के विकास व प्रसार, परागण-मित्र फसलों और मधुमक्खी-आधारित प्रणालियों को बढ़ावा, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन, स्थानीय बीज श्रृंखला सुदृढ़ीकरण तथा युवाओं और महिलाओं के लिए उद्यमिता विकास को प्राथमिकता देने की अनुशंसा की गई।
इस अवसर पर डॉ. वीपी सिंह भदौरिया एवं आवर्ती सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “किशोरावस्था: संवाद, समझ और डिजिटल युग की चुनौतियाँ” का विमोचन किया गया। भारतीय कृषि एवं बागवानी अनुसंधान विकास समिति के डॉ. जेके रंजन ने बताया कि सम्मेलन में 10 तकनीकी सत्र, 55 व्याख्यान तथा ऑस्ट्रेलिया, रूस, चिली, उज्बेकिस्तान, ईरान और अमेरिका से वर्चुअल व्याख्यान हुए। अंतर्राष्ट्रीय अतिथि डॉ. दिलफुज़ा जब्बारोवा (एचओडी, मेडिसिनल प्लांट, उज्बेकिस्तान) ने औषधीय फसलों की वैश्विक संभावनाओं पर विचार रखे।
सम्मेलन के दौरान उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए सर्वश्रेष्ठ मौखिक प्रस्तुति, सर्वश्रेष्ठ पोस्टर प्रस्तुति और सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक पुरस्कार प्रदान किए गए। राष्ट्रगान के साथ सम्मेलन का समापन हुआ। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी, सह-आयोजन सचिवगण, अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, नीति-निर्माता और शोधार्थी उपस्थित रहे। संचालन डॉ. अर्तिका सिंह तथा आभार डॉ. सोम दत्त (सचिव, एसएचआरडी) ने व्यक्त किया।
रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा

