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भक्तमाल कथा के अंतर्गत गुरु की महिमा बताई

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झांसी। सतगुरु कौन है जो कहे भजन करो भजन करो कोई पूछे सेवा तो कहे नाम जप करो भजन करो सब संतो में गुरु के रूप को देखो और जो स्वयं अपनी आरती पूजा ना करा कर भगवान की आरती पूजा करवाये अर्थात गुरु वह जो आपको सीधा हरी से जोड़े संत दर्शन से पातकों का नाश होता है अर्थात आपके शुभ कर्म प्रकट होते हैं और अशुभ कर्म का छय होता है भगवान में मन कैसे लगे उसके लिए संत चरणामृत और संत सीत प्रसाद ग्रहण करें तो निश्चित रूप से भजन में मन लगना शुरू हो जाता है और मन निर्मल हो जाता है और व्यक्ति भगवान का प्रिय हो जाता है भगवान कहते हैं “निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा”जब मन निर्मल हो जाता है तो कबीर जी के शब्दों में जिन भक्तों का मन निर्मल हो जाता है उनके पीछे-पीछे भगवान चलने रहते है और भगवान उनके चरणों की रज धारण करने लगे कुंभन दास जी का चरित्रसुनते हुए महाराज जी ने बताया कि श्रीनाथजी तभी प्रसाद ग्रहण करते थे जब कुम्भनदास जी पद गाते थे और श्रीनाथजी के सखा के रूप में ठाकुर जी के साथ लीला करते कथा के प्रारंभ में ग्रंथ की आरती श्री महंतराम प्रिया दास जी प्रेम नारायण दास, सुशील शर्मा, महेश शर्मा, अरुणा शर्मा, दिलीप तिवारी, अंचल अड़जरिया, उर्वशी भट्ट, विष्णु राय ने की।

रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा

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