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9 मोहर्रम: झांसी के हुसैनी इमामबाड़े में उमड़ा अकीदतमंदों का सैलाब, ताबूत की जियारत कर रो पड़े अजादार

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झांसी। यौम-ए-आशूरा (10 मोहर्रम) से ठीक एक दिन पहले, 9 मोहर्रम-उल-हराम को झांसी के ऐतिहासिक हुसैनी इमामबाड़े में अजादारों और अकीदतमंदों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। गम-ए-हुसैन में डूबे हजारों मोमिनों ने मजलिस में शिरकत कर शोहदा-ए-कर्बला को पुरनम आंखों से खिराज-ए-अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश की। दोपहर से ही इमामबाड़े की तरफ जाने वाले रास्तों पर सिर्फ और सिर्फ काले लिबास में मुसीबतों का जिक्र सुनने जाते अजादार नजर आ रहे थे।

कर्बला का संदेश सिर्फ एक मजहब के लिए नहीं, पूरी इंसानियत के लिए: मौलाना हुसैन रिजवी

मुकद्दस मजलिस का आगाज तिलावते-कुरान-ए-पाक से हुआ।

मौलाना सैयद इक़्तेदार हुसैन साहब ने अपने पुरअसर अंदाज में मर्सियाख़्वानी कर ग़मगीन माहौल तैयार किया। इसके बाद मिम्बर (व्यासपीठ) पर तशरीफ लाए अकबरपुर के सुप्रसिद्ध आलिम-ए-दीन मौलाना हुसैन रिजवी साहब ने पुरअसर अंदाज में मजलिस को खिताब किया।

मौलाना साहब ने अपने बयान में कर्बला के ऐतिहासिक और दर्दनाक वाकये पर रोशनी डालते हुए कहा कि, “नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने तपते हुए रेगिस्तान में भूखे-प्यासे रहकर अपने 72 जानिसारों, भाइयों और छह महीने के अली असगर की कुर्बानी सिर्फ इसलिए दी ताकि हक, इंसाफ और इंसानियत जिंदा रह सके।” उन्होंने आगे जोर देते हुए कहा कि कर्बला की जंग किसी हुकूमत के लिए नहीं बल्कि सिद्धांतों की जंग थी, जो हर दौर के मजलूम को जालिम के खिलाफ खड़े होने का हौसला देती है। मौलाना का यह बयान सुनकर पूरा पंडाल सिसकियों और ‘या हुसैन’ की सदाओं से गूंज उठा।

‘या हुसैन’ की सदाओं के बीच बरामद हुआ ताबूत, छलक पड़े आंसू

मजलिस के आखिरी हिस्से में जैसे ही इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मजलूम ताबूत (प्रतीकात्मक शव) की जियारत का ऐलान हुआ, इमामबाड़े का माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया। अकीदतमंद अपने महबूब इमाम के ताबूत को एक नजर देखने और उसे छूकर मन्नतें मांगने के लिए बेकरार नजर आए।

इस बेहद भावुक और गमगीन माहौल में नौहाख्वानों ने रूह को झकझोर देने वाली आवाजों में नौहा पढ़ा। नौहाख्वानी करने वालों में मुख्य रूप से: अजीम हैदर, सलमान हैदर, सैयद सुखनवर अली आब्दी, अनवर नकवी, साहिबे आलम, फुरकान हैदर, सईदउज जमां, अली समर, अदीब हैदर शामिल रहे। नौहाख्वानों ने जब कर्बला की बेबसी और शहादत के मंजर को अपने लफ्जों में पिरोकर पढ़ा, तो वहां मौजूद कोई भी शख्स अपने आंसुओं को रोक नहीं पाया। बुजुर्ग, नौजवान और बच्चे सभी जार-ओ-कतार रोते नजर आए।

हजारों खवातीन और मर्दों ने की शिरकत, सुरक्षा के रहे कड़े इंतजाम

इस मजलिस और जियारत के प्रोग्राम में सिर्फ झांसी शहर ही नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों और कस्बों से भी हजारों की तादाद में खवातीन (महिलाओं) और मर्दों ने शिरकत की। महिलाओं के बैठने के लिए इमामबाड़े में अलग से पर्दापोश इंतजाम किए गए थे।

भीड़ को देखते हुए इमामबाड़ा इंतजामिया कमेटी, अंजुमन-ए-अब्बासिया के वालंटियर्स और स्थानीय प्रशासन मुस्तैद नजर आया। सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखने के लिए पुलिस बल तैनात रहा। मजलिस के इख्तेताम (समापन) पर मुल्क में अमन-ओ-अमान, भाईचारे और खुशहाली के लिए विशेष दुआएं मांगी गईं। इसके बाद अजादारों में तबर्रुक का वितरण किया गया।

रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा

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