
झाँसी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में अधिसूचित “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026″ को लेकर विधिक जगत में विरोध के स्वर प्रखर होने लगे हैं। बुधवार को तहसील टहरौली के अधिवक्ताओं ने एडवोकेट रीतेश मिश्रा ‘राघवेन्द्र’ के आवाहन पर एवं टहरौली बार संघ के पूर्व अध्यक्ष राजीव समाधिया, अश्वनी पटैरिया और नरोत्तम शर्मा के संयुक्त नेतृव में इस नियमावली को असंवैधानिक करार देते हुए देश के प्रधानमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन उपजिलाधिकारी (SDM) टहरौली गौरव आर्या को सौंपा।
संविधान के मूल ढांचे पर प्रहार का आरोप
अधिवक्ताओं ने ज्ञापन के माध्यम से केंद्र सरकार को चेताया कि यूजीसी के नए नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकारों का खुला उल्लंघन करते हैं। ज्ञापन में तर्क दिया गया है कि ‘इक्विटी’ की आड़ में लाए गए ये प्रावधान वर्ग-विशेष पर आधारित हैं, जो समान परिस्थितियों वाले विद्यार्थियों के बीच भेदभाव पैदा करेंगे।
विधिक आपत्तियों के मुख्य बिंदु:
ज्ञापन में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए चार प्रमुख चिंताएं जताई गई हैं:-
अनुच्छेद 14 का उल्लंघन:- ई.पी. रॉयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य मामले का जिक्र करते हुए कहा गया कि कोई भी नियम जो मनमाना (Arbitrary) हो, वह समानता के अधिकार के विरुद्ध है।
नेचुरल जस्टिस (प्राकृतिक न्याय) की अनदेखी:- अधिवक्ताओं का कहना है कि नए नियमों में शिकायत तंत्र को इतना एकपक्षीय बनाया गया है कि इसमें ‘Audi Alteram Partem’ (दूसरे पक्ष को सुनो) के सिद्धांत की अनदेखी की गई है, जिससे मेधावी छात्रों के करियर और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
मेरिट प्रणाली पर आघात:- इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले का संदर्भ देते हुए कहा गया कि सामाजिक न्याय के नाम पर आरक्षण या विशेष प्रावधान असीमित नहीं हो सकते। वर्तमान नियम मेरिट आधारित शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करते हैं।
अस्पष्ट शब्दावली:- नियमों में प्रयुक्त भाषा को अस्पष्ट और विवेकाधीन शक्तियों से युक्त बताया गया है, जो ‘डॉक्ट्रिन ऑफ प्रोपोर्शनालिटी’ (आनुपातिकता का सिद्धांत) के विपरीत है।
प्रमुख माँगें:-
”Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” को तत्काल प्रभाव से निरस्त/वापस लिया जाए।
शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर कोई भी नियम लागू करने से पूर्व विधिक विशेषज्ञों, शैक्षणिक संस्थानों और सभी वर्गों से व्यापक परामर्श किया जाए।
समानता के अधिकार और मेरिट आधारित शिक्षा प्रणाली का पूर्ण संरक्षण सुनिश्चित हो।
इस अवसर पर एडवोकेट रीतेश मिश्रा, राजीव समाधिया, अश्वनी पटैरिया, नरोत्तम शर्मा, अमित शर्मा, रजनीश बाजपेयी, संजय शर्मा, नरेश समाधिया, राघवेन्द्र रिछारिया, चन्द्रपाल सिंह बुन्देला, वीरेन्द्र तिवारी, दीपक पस्तोर, अंकित पाण्डेय, रामबाबू वशिष्ठ, आदित्य शुक्ला, ब्रजेन्द्र पटैरिया, अमित खरे, चन्द्रशेखर चतुर्वेदी सहित तहसील के कई अधिवक्तागण मौजूद रहे। जिन्होंने एक स्वर में इस नियमावली को वापस लेने की माँग की।
रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा

