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सोमनाथ से बुंदेलखंड तक आस्था, इतिहास और पुनर्जागरण का दिव्य संगम” 30 मार्च को बरुआ सागर मे

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झांसी। आर्ट ऑफ लिविंग परिवार झांसी के तत्वावधान में 30 मार्च 2026 को झांसी में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अंश झांसी आ रहे है। ज्योतिर्लिंग के अंश के दर्शन शाम चार बजे से होंगे। यह जानकारी आर्ट ऑफ लिविंग परिवार झांसी के पदाधिकारियों द्वारा दी गई।

शुक्रवार को सर्किट हाउस में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान आयोजकों ने बताया कि आर्ट ऑफ लिविंग परिवार, झाँसी एवं स्वर्ग आश्रम समिति, बरुआसागर के संयुक्त तत्वावधान में, श्री श्री रवि शंकर के स्नेह एवं आशीर्वाद से दिनांक 30 मार्च 2026 शाम 04:00 बजे को ब्रह्मलीन स्वामी शरणानंद सरस्वती की पावन तपो स्थली स्वर्ग आश्रम, बरुआसागर (झाँसी) में भगवान सोमनाथ महादेव से जुड़ा एक अत्यंत पावन, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक आयोजन संपन्न होने जा रहा है। यह केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की आस्था, संघर्ष, बलिदान और पुनर्जागरण की जीवंत गाथा का पुनर्प्रकाश है।

 

इतिहास की प्रेरक गाथा

 

इतिहास साक्षी है कि वर्ष 1025-1026 ई. में महमूद गज़नवी ने लगभग 1000 मील दूर से विशाल सेना के साथ सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। उस समय हजारों ब्राह्मण एवं लगभग 50,000 श्रद्धालु पूजा-अर्चना में लीन थे। इस पावन वातावरण को भंग करते हुए भीषण जनसंहार हुआ और अपार धन-संपदा की लूट की गई। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि सोमनाथ मंदिर पर अनेक बार आक्रमण हुए लगभग 17 बार मंदिर को तोड़ा गया, किंतु हर बार भारत की जनता, राजाओं और श्रद्धालुओं ने उसे पुनः स्थापित किया।

आस्था को कभी पराजित नहीं किया जा सकता।”

इस संघर्ष में वीरता की भी अमर गाथाएँ जुड़ी हैं। विशेष रूप से युवा राजपूत योद्धा वीर हमीरजी गोहिल ने अल्पायु में ही सोमनाथ की रक्षा हेतु अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी स्मृति आज भी हमे यह प्रेरणा देती। धर्म और आस्था की रक्षा सर्वोच्च कर्तव्य है।” लगातार आक्रमणों के पश्चात महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया तथा गर्भगृह को सुरक्षित स्वरूप प्रदान किया, जिससे इसकी पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहे।

 

स्वतंत्र भारत में पुनर्जागरण

स्वतंत्र भारत में, उस समय की सरकार के मार्गदर्शन में सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प से दिनांक 12 नवम्बर 1947 को सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। 1949 में सोमनाथ ट्रस्ट गठन हुआ और 11 मई 1951 को प्रातः 9:47 बजे, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा हजारों संतों की उपस्थिति मे मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई। यह स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान का पुनर्जागरण था।

पौराणिक एवं वैज्ञानिक महत्व

पौराणिक मान्यता के अनुसार, दक्ष प्रजापति के श्राप से पीड़ित चंद्रदेव ने सोमनाथ तट पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया और यहा प्रथम ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई। समय के साथ मंदिर का स्वरूप भी बदलता रहा सतयुग में स्वर्ण, त्रेतायुग में रजत एवं द्वापर में चंदन से निर्मित होने की मान्यता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी सोमनाथ का विशेष महत्व है। समुद्र तट पर स्थित मंदिर का स्तंभ यह संकेत देता है कि यहा से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई भूभाग नही है जो हमारे प्राचीन ज्ञान की उत्कृष्टता को दर्शाता है।

हाल के वर्षों मे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर से जुड़ अध्ययन मे यह संकेत प्राप्त हुए कि मंदिर के नीच विभिन्न गहराइयों (लगभग 2.5 मीटर, 5 मीटर एवं 7.5 मीटर) पर संरचनात्मक स्तर विद्यमान हैं, जो इसकी बहु-स्तरीय एवं प्राचीन विरासत को दर्शाते हैं।

अखंड परंपरा का संरक्षण

आध्यात्मिक परंपरा के अनुसार, गजनी के आक्रमण के पश्चात कुछ अग्निहोत्री ब्राह्मणो ने शिवलिंग के पावन अंशों को सुरक्षित रखा और पीढ़ियो तक उनकी गुप्त रूप से पूजा की। कथनानुसार वर्ष 1924 में कांची पीठ के पूज्य शंकराचार्य ने निर्देश दिया कि इन पावन अवशेषों की रक्षा कर उन्हें 100 वर्ष पश्चात बेंगलुरु स्थित एक संत को सौंपा जाए। इसी परंपरा के अनुसार, लगभग 2024-2025 में ये पावन अंश परम पूज्य गुरुदेव रवि शंकर को समर्पित किए गए, जो आज इस दिव्य परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।

बुंदेलखंड के लिए ऐतिहासिक क्षण

अब वही दिव्यता, वही परंपरा, वही आशीर्वाद बुंदेलखंड की पावन धरती, झाँसी में साकार होने जा रहा है।

अत्यंत गौरव और सौभाग्य का विषय है कि हजारों वर्षों तक संघर्ष और विपरीत परिस्थितियो का सामना करने के पश्चात स्वयं सोमनाथ महादेव इस क्षेत्र को आशीर्वाद देने आ रहे हैं।

उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या मे उपस्थित होकर रुद्र पूजा एवं दर्शन का लाभ ओर भगवान सोमनाथ के दर्शन लाभ लेने की अपील की है,यह अवसर जीवन मे बार-बार नहीं आता। यह आस्था का उत्सव है, इतिहास से साक्षात्कार है।

इस अवसर पर आयोजित प्रेस वार्ता में आर्ट ऑफ लिविंग की जोनल कोऑर्डिनेटर श्रीमती कंचन आहूज स्वर्ग आश्रम समिति, बरुआसागर के उपाध्यक्ष राहुल रिछारिया के साथ-साथ आर्ट ऑफ लिविंग परिवार एवं स्वर्ग आश्रम समिति के सम्मानित सदस्यगण उपस्थित रहे।

रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा

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