
झाँसी। बुंदेलखंड में लगातार हो रही भारी वर्षा को देखते हुए रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी के फल वैज्ञानिक डॉ. रंजीत पाल ने फल उत्पादक किसानों को बागों में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है।
उन्होंने कहा कि लंबे समय तक जलभराव रहने से फलदार पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन की कमी, जड़ सड़न, पोषक तत्वों के ह्रास, फलों के फटने एवं गिरने तथा फफूंद और जीवाणुजनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
उन्होंने किसानों को सलाह दी कि भारी वर्षा के तुरंत बाद बाग से अतिरिक्त पानी निकालना सबसे जरूरी कार्य है। कतारों के बीच बनी नालियों की सफाई कर पानी का निकास सुनिश्चित करें।
विशेष रूप से नींबू वर्गीय फल, पपीता, अनार, अमरूद और नए लगाए गए पौधों में जलभराव न होने दें। गीली मिट्टी में अनावश्यक सिंचाई और तत्काल अधिक मात्रा में उर्वरक का प्रयोग न करें।
डॉ. पाल ने बताया कि आम के बागों में जलभराव के साथ एन्थ्रेक्नोज व फल सड़न जैसे रोगों की निगरानी करें।
अमरूद में फटे, सड़े एवं गिरे फलों को बाग से बाहर निकालें। अनार में रोगग्रस्त फल, पत्तियां एवं शाखाएं हटाकर वायु संचार बनाए रखें।
पपीता जलभराव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, इसलिए इसकी जड़ों के आसपास पानी बिल्कुल जमा न होने दें।
बेल और ड्रैगन फ्रूट के युवा पौधों में भी उचित जल निकास सुनिश्चित करें।
भारी वर्षा के दौरान अथवा वर्षा की संभावना से ठीक पहले कीटनाशक एवं फफूंदनाशी का छिड़काव न करें, क्योंकि दवा धुल जाने से उसका प्रभाव कम हो जाता है। रोग या कीट के लक्षण दिखाई देने पर संबंधित फसल के लिए अनुशंसित दवा एवं मात्रा का प्रयोग कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही करें।
वर्षा के बाद फटे, चोटिल और रोगग्रस्त फलों को स्वस्थ फलों से अलग रखें। तुड़ाई के बाद फलों को सूखी, छायादार और हवादार जगह पर रखें। बाग की नियमित निगरानी करते हुए जल निकासी नालियों को साफ, जड़ों को सुरक्षित और रोगग्रस्त अवशेषों को बाहर रखना किसानों की प्राथमिकता होनी चाहिए।
रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा

