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पुरुषोत्तम मास में 15 मई से 16 जून तक होंगे धार्मिक आयोजन

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झांसी। 15 मई को श्री मुरली मनोहर मंदिर के प्रांगण में पुरुषोत्तम मास को लेकर पत्रकार वार्ता का आयोजन किया गया। जिसमें व्यस्थापक पं वसंत विष्णु गोलवलकर ने पुरुषोत्तम मास के महत्त्व को बताया एवं समस्त कार्यक्रमों की जानकारी दी।

16 मई (शनिवार) से 15 जून 2026 (सोमवार) तक मंदिर में अधिक मास का आयोजन किया जायेगा। जिसके अंतर्गत प्रतिदिन प्रातः काल में मंगल ध्वनि, श्री मंगला आरती, राजोपचार – षोडशोपचार पूजन, महाभिषेक, वेदपाठ, पुरुषोत्तम मास हरिकथा, शृंगार आरती, राजभोग आरती एवं भजन कीर्तन होंगे। इसी क्रम में सायंकाल में वर्ष में होने वाले सभी प्रमुख पर्व क्रमानुसार मनाये जायेंगे, इसमें झांकी दर्शन, श्रृंगार आरती, शास्त्रीय संगीत, लोकगीत, शयन दर्शन आदि कार्यक्रम समय से होंगे।

 

इस पत्रकार वार्ता में पं. लक्ष्मण कृष्ण गोलवलकर, पियूष रावत, ओमप्रकाश चौकसी, संजय अग्रवाल (हौजरी) कृष्णकांत मिश्रा, संजीव अग्रवाल (हौजरी), पुरुषोत्तम स्वामी, मनमोहन गेड़ा, विनोद अवस्थी, प्रभात शर्मा, पवन गुप्ता, सतेंद्र पुरी गोस्वामी, अभिषेक साहू, अतुल मिश्रा, चिराग अग्रवाल, आशीष मिश्रा, अजय राय, आशुतोष अग्रवाल किलपन, संतू दुबे, सक्षम रायकवार आदि उपस्थित रहे। अंत में हर्षल गोलवलकर एवं वेदांत गोलवलकर ने सभी पत्रकार बंधुओं का आभार व्यक्त किया।

 

अधिक मास का महत्त्व

 

पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिमास या मलमास भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र समय है। यह हर तीसरे वर्ष आता है जब सूर्य संक्रांति और चंद्र मास के बीच सामंजस्य बिठाने के लिए एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है।

 

१. इसका नाम “पुरुषोत्तम” क्यों पड़ा?

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस महीने को “मलमास” (गंदा महीना) कहकर तिरस्कृत किया जाता था क्योंकि इसमें कोई मांगलिक कार्य (विवाह, मुंडन आदि) नहीं होते थे। जब इस महीने ने अपनी व्यथा भगवान विष्णु को सुनाई, तो उन्होंने इसे अपना श्रेष्ठ नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया और इसे सभी महीनों में सबसे फलदायी होने का वरदान दिया।

 

२. आध्यात्मिक महत्व

 

इस मास में भौतिक कार्यों की तुलना में आध्यात्मिक साधना को प्रधानता दी जाती है:

 

तप और दान: इस महीने में किए गए दान, व्रत और तप का फल अन्य महीनों की तुलना में कई गुना अधिक माना जाता है।

 

श्रीमद्भागवत कथा: इस दौरान भागवत पुराण का श्रवण और पाठ करना विशेष रूप से शुभ होता है।

 

दीपदान: मंदिरों और पवित्र नदियों के तट पर दीप प्रज्वलित करने का बड़ा महत्व है।

 

३. क्या करें और क्या न करें?

 

वर्जित कार्य: चूंकि इसे आध्यात्मिक शुद्धि का समय माना जाता है, इसलिए इसमें विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यापार की शुरुआत या संपत्ति की खरीद जैसे काम्य कर्म (सांसारिक लाभ के लिए किए गए कार्य) नहीं किए जाते।

 

अनुशंसित कार्य: भगवान विष्णु (श्री कृष्ण) की भक्ति, मंत्र जाप (जैसे ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’), पवित्र नदियों में स्नान और सात्विक भोजन करना चाहिए।

रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा

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