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अहंकार का त्याग कर विनम्रता धारण करें : विशाश्री माताजी     

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झांसी। अतिशय क्षेत्र करगुवांजी में चल रहे 48 दिवसीय 1008 भक्तामर महा मण्डल आराधना विधान के उन्तालीसवें दिन गुरुवार को गणिनी आर्यिका 105 विशाश्री माताजी ने मंगल‌ देशना देते हुए कहा कि राजा के सिंहासन पर तो केवल एक छत्र होता है पर जो भगवान तीन‌ लोक के शिखर पर विराजमान हैं, उनके सिंहासन के ऊपर तीन तीन छत्र लगे हैं। भगवान के साथ उनका सिंहासन, उसके ऊपर लगे छत्र ,चंवर आदि जो सभी निर्जीव वस्तुएं होते हुए भी पूज्य हैं पर मानव देह का पर्याय प्राप्त करने वाला जीव अपने जीवन काल तक अपने कर्मों के विरूद्ध युद्ध करता रहता है पर अपने भीतर, सहजता सरलता और विनम्रता प्रकट नहीं कर पाता है। उन्होंने कहा कि जिसके भीतर विनम्रता होती है वहीं झुकता है और जो झुकता है वहीं ऊपर उठता जाता है। उन्होंने कहा कि अहंकार जिसमें होता है उसमें अकड़ होती है,अंत: अहंकार का त्याग कर सहजता सरलता और विनम्रता के गुण धारण करो। यही गुण पूज्य हैं जो भगवान बनने की राह खोलते हैं। ‌‌ इससे पूर्व गुरुवार के पुण्यार्जक श्रीमती निशा नीरज जैन, श्रीमती सोनम सुनील जैन,अभिनव, अध्यान,जौनी एवं समस्त सिंघई परिवार टहरौली रहे, जिन्होंने शांतिधारा का सौभाग्य प्राप्त किया, माताजी को शास्त्र भेंटकर पाद प्रक्षालन कर पं दीपक जैन करैरा के मार्गदर्शन में समस्त धार्मिक क्रियायें सम्पन्न कराते हुए अर्घ समर्पित किये।

तदुपरांत पुण्यार्जक परिवारों का माला एवं पगड़ी पहनाकर दिगम्बर जैन पंचायत समिति के पदाधिकारियों ने सम्मानित किया।संचालन पंचायत समिति के महामंत्री कमल जैन लोकपथ एवं करगुवांजी मंत्री एड.शिरोमणी जैन ने संयुक्त रूप से किया।अंत में विधि सलाहकार अशोक जैन ने सभी का आभार व्यकत किया।

रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा

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