झांसी। लगातार झांसी खास में आराजी नंबर 816 में नापजोख के मामलों में अक्सर अधिकारी यह रिपोर्ट लगाते थे कि नाम नहीं हो पाएगी झांसी खास का नक्शा फटा हुआ है। लेकिन अमर भारती समाचार पत्र ने यह मामला उठाया तो नक्शा भी मिल गया और नगर निगम ने अपनी सरकारी जमीन चिन्हित भी कर ली। समाचार प्रकाशित होने के बाद नगर निगम की टीम ने आज पिलर भी गाड़ कर अपनी जमीन सुरक्षित कर ली। लेकिन जो जमीन सुरक्षित की है वह रुपए में चार आने ही है। बाकी की जमीन को भू माफियाओं ने भ्रष्टाचारियों के साथ मिलकर फर्जी रजिस्ट्रियां कर बेच दी। जिन पर आज बड़े बड़े महल बने है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अधिकारी जनता को नापजोख के नाम पर नक्शा फटा होने की बात कहकर कागजों में लिखकर गुमराह क्यों कर रहे थे। खबर प्रकाशित के बाद नगर निगम के पास नक्शा भी आ गया। अगर अधिकारियों की बात सही माने की नक्शा फटा है तो आज नगर निगम ने झांसी खास आराजी संख्या 816 में किसकी जमीन पर पिलर गाड़ दिए। साथ ही आराजी 816 में सरकार की करोड़ों कीमत की बेशकीमती जमीन पर फर्जी रजिस्ट्रियां कर किसने जमीन बेच कर मकान बनवा दिए। इस सरकारी जमीन की रखवाली की जिम्मेदारी लेने वाले उस वक्त कहा थे। खबर प्रकाशित ओर शासन में शिकायत के बाद क्यों जागे जिम्मेदार अब ढूंढ रहे अपनी जमीन। सूत्र बताते है कि झांसी खास आराजी 816 में सरकार की करोड़ों कीमत की बेशकीमती जमीन पड़ी थी। यहां फॉरेंसिंक लैब बनाना थी। फॉरेंसिंक लैब के लिए जमीन चिन्हित होकर टपरे भी बन गए थे। लेकिन यहां खंडहर ज्यादा होने पर फॉरेंसिंक लैब बनाने का जितना बजट आया था उससे ज्यादा तो जमीन समतल कराने में लग जाता। इसी के चलते फॉरेंसिंक लैब राजगढ़ स्थानांतरित हो गई थी। जब लैब स्थापित होने के लिए जमीन चिन्हित हुई थी उस समय तत्कालीन जिलाधिकारी ने भी वहां मौका मुआयना करते हुए अवैध मकान कब्जे को हटाने के निर्देश दिए थे। जिसके चलते कई एकड़ों में सरकारी जमीन पर बने अवैध निर्माण को भी कब्जे में लेकर पिलर गाड़े गए थे। लेकिन जैसे ही फॉरेंसिंक लैब राजगढ़ स्थानांतरित हुई। भू माफियाओं ने भ्रष्टाचार में डूबे जिम्मेदारों के साथ मिलकर यहां की सरकार की करोड़ों कीमत की बेशकीमती जमीन नोचना शुरू कर दी। आज इस जमीन की यह स्थिति है कि यहां रुपए में चार आने पैसे जमीन बची है। भू माफियाओं ने भोलेभाले लोगों को फर्जी रजिस्ट्रियां कर जमीन बेच दी। इसका जिम्मेदार कौन है यह बड़ा सवाल बना है।
रिपोर्ट – मुकेश वर्मा/राहुल कोष्टा






